Promotion of Art and culture of india


 भारत विविधताओं से भरा देश है। यहां हर तरह का मौसम, हर तरह के लोग आपको मिलेंगे और उनके अनुभव भी बहुत ही दिलचस्प मिलेंगे। भौगोलिक व सामाजिक रूप से बहुत-सी कहावतें प्रचलित हैं, जो कम शब्दों में बहुत ही गंभीर बात कह देेती हैं। ऐसी ही एक कहावत है..... कोस-कोस में पानी बदले तीन कोस में वाणी अर्थात यहां एक कोस में पानी की तासीर बदल जाती है और तीन कोस में वाणी। इसलिए आपको भारत में न जाने कितनी भाषाएं व बोलियां मिल जाएंगी, जो उस क्षेत्र की पहचान भी होती हैं। इसी तरह भारत के अलग-अलग क्षेत्र में वहां की कुछ विशेषताएं भी बहुत प्रसिद्ध हैं। कहीं पर पीतल की कलाकारी मशहूर है तो कहीं पर बांस की.... कहीं पर बांसुरी तो कहीं पर चित्रकारी... इन सब कलाओं को वहां के अनुभवी कलाकार अंजाम देते हैं। उन्होंने अपने पूर्वजों से वह कला सीखकर उसे अनवरत आगे बढ़ाया। साथ ही आने वाली पीढ़ियों को भी हस्तांतरित किया। ग्लोबलाइजेशन व मशीनीकरण ने आज उपभोग व उत्पादकता तो बढ़ा दी है लेकिन इसकी प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से उन्हें बहुत हानि हुई है जो पारम्परिक कार्य से जुड़े थे। ग्लोबलाइजेशन ने बाज़ार में अपने उत्पादों का भरपूर प्रचार कर उसे घर-घर तक पहुंचा दिया। चूंकि उपभोग अधिक होने से लागत में भी कमी आई जिस कारण वह सस्ती दरों पर भी उपलब्ध होने लगी। जिसका सीधा घाटा उन कलाकारों को हुआ जो अपने हाथों की जादूगरी से शानदार वस्तुओं को बनाते थे।

आज ऐसे कलाकारों को अपनी रोटी के लिए भी रोज़ संघर्ष करना पड़ रहा है। दिल्ली के शादीपुर इलाके में एक ऐसी ही सरकार द्वारा बसाई गई झुग्गी हैजहां पर ऐसे कलाकार रहते हैं। जो हस्तनिर्मित बहुत ही सुंदर वस्तुएं बनाते हैं। परंतु वहां पर इन कलाकारों की हालत बहुत ही ख़राब है। ऐसे ही देश में न जाने कितनी जगहों पर इस तरह के कलाकार उपेक्षा के शिकार होकर दो जून की रोटी के लिए संघर्ष करने को मजबूर होते होंगे। अक्सर ऐसी ख़बरें भी सुनने को मिलती रहती है। बनारस के बुनकर हों या मुरादाबाद के पीतल उद्योग में लगे श्रमिक.... सभी इस तरह की समस्याओं से परेशान हैं।

ऐसा नहीं है कि लोग इनकी वस्तुओं की क़द्र नहीं करते हैं या ऐसी वस्तुएं ख़रीदते नहीं हैं। अक्सर शहरों में लगने वाले हस्तशिल्प मेलों में लोगों की भीड़ भी काफ़ी उमड़ती हैसाथ ही ख़रीदारी भी होती है। परंतु उस मात्रा में ख़रीदारी नहीं होती हैजिस मात्रा में उत्पादन होता है व कलाकार मौजूद हैं। जिस कारण उनको अधिक आर्थिक लाभ प्राप्त नहीं हो पाता है।

इन्हीं सारी समस्याओं को देखते हुए दिल्ली स्थित सकोया फाउंडेशन ने एक ऐसे मंच को बनाने का प्रयास किया है। जहां ऐसे कलाकारों को संरक्षण मिल सके तथा उन कलाओं को संजोया जा सकेजो भारत को गौरव प्रदान करती हैं।

सकोया फाउंडेशन मुख्यतऐसे लोगों का एक आंकड़ा तैयार कर रहा हैजिससे कलाकारों की सारी जानकारी एक छत के नीचे उपलब्ध हो सके यानि सभी लोगों को अपनी वैबसाइट पर स्थान प्रदान कर रहा है। जितने भी कलाकार इस फाउंडेशन से जुड़ चुके हैंउन सभी कलाकारों की सारी जानकारी यहां मौजूद है। अब तक देश के विभिन्न भागों से अनेक प्रकार के कलाकारों को यहां जोड़ा जा चुका है। उनकी पूरी जानकारी वैबसाइट पर उपलब्ध है कि वो क्या करते हैं.... कहां रहते हैं.... उनका मोबाइल नंबर इत्यादि सब कुछ वैबसाइट पर उपलब्ध करवा दिया गया है।

सकोया फाउंडेशन लोगों से अपील भी करता है कि यदि इस प्रकार के किसी कलाकार कीकिसी को कोई जानकारी हो जो अभावों में ज़िन्दगी जीने को मजबूर हैउसकी वैबसाइट के माध्यम से जानकारी दी जा सकती है। जिससे उनसे संपर्क कर उनको भी वैबसाइट में जगह दी जा सके और उनको काम व मदद उपलब्ध हो पाए।

सकोया फाउंडेशन की फाउंडर से बात करने पर पता चला कि वो इस काम को आगे और तेज़ी से बढ़ाना चाहती हैं ताकि ऐसे कलाकारों को जल्द से जल्द काम व मदद मिल सके। साथ ही इनकी कलाओं का संरक्षण हो सकेजो भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न हिस्सा है।




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